यथार्थ

My viewpoint on today's Politics and Political issues

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ashutosh


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यह जीत सुख नहीं दे रही

Posted On: 16 Jun, 2011  
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sports mail में

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गेंद, कुत्ता, गेट और होली

Posted On: 26 Feb, 2010  
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Others मस्ती मालगाड़ी में

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खुद से डरो, शिवसेना से नहीं

Posted On: 11 Feb, 2010  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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उनके बहाने इनकी बात

Posted On: 25 Jan, 2010  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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Hello world!

Posted On: 25 Jan, 2010  
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Others में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

के द्वारा:

यादें तो होती ही हैं ऐसी। अतीत हमेशा सुखद लगता है। आपका लेख पढकर लगा कि जो लोग दो घूंट लेकर सोने की तैयारी में होंगे वे भी भले हौदिया के रंग में न नहायें लेकिन थोडा बहुत रंगीन जरुर होंगे। हम लोग गांव के रहने वाले हैं और हमें तो याद है कि बसंत पंचमी के दिन से ही हमारी शुरुआत होती थी। होलिका सामग्री को हम लोग सम्‍मत जुटाना बोलते थे और उन दिनों जिनकी सबसे ज्‍यादा रंगबाजी होती उनकी चौकी या खटिया जरुर सम्‍मत में डाल देते। दो तीन दिन पहले से ही गांव की गलियों में कीचड किस ओर से आ जाय कहना मुश्किल था। फागुन आते ही बाबा लोग देवर की भूमिका में दिखने लगते। पर सच कहें तो अब सब कुछ कहीं न कहीं छूट गया है। गांव जाने पर भी वे पुराने दिन लौट नहीं पाते हैं। कोशिश करने पर भी उन दिनों की वापसी नहीं हो पाती। नये बच्‍चे कीचड की बात छोडिये, रंगों के केमिकल पर भी बहस करते हैं। न तो रंगों की वह चटख है और न ही रिश्‍तों की गर्मजोशी। पर आपके इस लेख से बचपन के ढेर सारे संदर्भ मन मानस पर ऐसे उभर आये जैसे किसी सिनेमा का फ़लैश बैक। बहुत अच्‍छा लगा। बहुत बहुत बहुत बधाई। आपको होली की ढेर सारी शुभकामना। आप और आपके पूरे परिवार को रंग खूब चढे। रंगों के साथ रिश्‍तों का रंग भी खूब चटख हो। आनन्‍द रायए दैनिक जागरण गोरखपुर।

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

भाई साहब आज ही गर्ग, गौतम और शांडिल्‍य गोत्र को लेकर हमारे यहां बहस हो रही थी। अभी आपके लेख को पढा तो इतना सामयिक लगा कि क्‍या कहूं। आपने बहुत सच कहा है अब तो लोगों ने महापुरुषों को भी जातियों और खेमों में बांट लिया है। एक दौर रहा जब जाति और क्षेत्र की बात करते समय लोग संकोच करते थे। बाला साहब ठाकरे को कौन समझाये। मधुकर दिघे महाराष्‍ट्र के हैं और 50 के दशक में ही गोरखपुर आ गये। यहां के लोगों ने उन्‍हें कंधे पे बिठाया। अपनी रहनुमाई सौंपी। सरकार में वे मंत्री बने और महामहिम बनने का भी अवसर मिला। उनके दिल से कोई पूछ्रे तो बाला की दी हुई टीस का दर्द बतायेंगे। यकीनन तटस्‍थ रहने की जरुरत नहीं है। प्रतिरोध होना चाहिये और शब्‍दों की तलवार से किया जा रहा इस तरह का ही प्रतिरोध सार्थक होगा। पहले हम सुधरेंगे तब जग सुधरेगा। बधाई। अच्‍छा लगा। सिलसिला जारी रहे।

के द्वारा: Anand Rai, Jagran Anand Rai, Jagran

बधाई ..... आप खूब बरसे। ..... दरअसल यह बहस ही झूठ है और पोंगापंथी है। पुरबियों बनाम मराठियों और इनके जैसे तमाम खांचों को तोडकर इतिहास कंपोस्‍ट खाद में बदल चुका है। अब मूल्‍यांकन के पैमाने और लोगों की जरुरतें ही दूसरी हैं। अशक्‍त और ढकरते बाल ठाकरे तथा उगने की को‍शिश में टेढ़े होते राज और उद्धव को पता ही नहीं कि उनकी हांडियां काठ की नहीं बल्कि कागज की हैं। मगर कागज काठ से ज्‍यादा तेजी से जलता है सो चमक कर जल रहा है।.... रही बात बड़े लोगों की तो उनकी बड़ी बडी बातें। .... उनका बोलना अगर फायदा कराये तो मुंडू पहन लेंगे और नहीं तो अराजनीतिक। जो बोल रहे हैं, उनकी भी गणित है।..... इन लोगों की भली चलाई... वैसे आपका बरसना अच्‍छा लगा।..... सादर साधुवाद ... अंशुमान

के द्वारा:

आदरणीय आशुतोष जी आपने उम्मीद जगाई है. अगले आम चुनाव में बेहतर तस्वीर बनाने की, उजले रंग भरने की, उससे मन के कोने में छाया घना अन्धेरा मिटा है. हमेशा मेरी सोच सकारात्मक रही है, कभी अनहोनी की आशंका मुझे बेचैन नहीं की, कभी ये होगा तो क्या होगा और वो होगा तो क्या होगा, इसे भी सोच कर परेशान नहीं हुआ, लेकिन ठेकेदारी के इस दौर में नयी पीढी मुझे हताश करती रही है. मोबाइल युग में सब कुछ जल्दी पा लेने की चाह ने रिश्ते, नाते, आदर्श और मर्यादा को पीछे छोड़ दिया. पर ऐसे लोगों को आईना दिखाने के लिए आपने जो उदाहरण दिया वह बहुत ही प्रेरक है. जीरादेई आज भी गवाह है, महादेवी जी और उनसे जुड़े संस्मरण आपने ताजा कर दिए. एक आदर्श सामने रखा. यही अच्छी चीजें हमारी नयी पीढी को एक बेहतर रास्ता देंगी. वाकई बेहतर जिन्दगी का रास्ता बेहतर संदेशों से ही गुजरता है. एक बात और राजेन्द्र प्रसाद जी के नाती की रिहाइश गोरखपुर में है. लोग कहते हैं उनका नाम कभी नोबल पुरस्कार के लिए गया था. दुनिया घूमते हैं पर गोरखपुर में सहज ढंग से सड़क पर टहलते हैं. माडल ऐसे बनते हैं. बहुत बहुत धन्यवाद.

के द्वारा:




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